सफलता की राह,राष्ट्रीय पशुधन मिशन से बदली सुरेन्द्र की किस्मत, भेड़ पालन बना आय का सशक्त जरिया

रिपोर्ट – जय शंकर पांडे

Aug 7, 2026 - 16:33
सफलता की राह,राष्ट्रीय पशुधन मिशन से बदली सुरेन्द्र की किस्मत, भेड़ पालन बना आय का सशक्त जरिया
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जगदलपुर,07 अगस्त 2026/ परंपरागत खेती-किसानी के साथ यदि सही समय पर सही तकनीक और सरकारी योजनाओं का सहारा मिल जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बेहतर सुधार हो सकती है। इसे बस्तर जिले के बकावंड विकासखंड के तोंगकोंगेरा निवासी प्रगतिशील किसान सुरेन्द्र देवांगन ने अपनी लगन और मेहनत से पूरी तरह साबित कर दिखाया है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन से प्रेरणा लेकर उन्होंने भेड़ पालन की दिशा में जो कदम बढ़ाया था, आज वह उनके परिवार के लिए न केवल बेहद लाभकारी, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश करने वाला मुख्य व्यवसाय बन चुका है।

        सुरेन्द्र बताते हैं कि भेड़ पालन की शुरुआत करने से पहले उन्होंने इस व्यवसाय की बारीकियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का पक्का इरादा किया। इसके लिए वे उत्तरप्रदेश के मथुरा चले गए और वहां रहकर बाकायदा इस क्षेत्र का आधुनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया। हालांकि इस यात्रा और प्रशिक्षण में उनके करीब 20 से 25 हजार रुपये खर्च हुए, लेकिन वहां से मिले व्यावहारिक अनुभव ने उनके इस नए सफर की मजबूत नींव रख दी। मथुरा से लौटने के बाद उन्होंने योजना के तहत आवेदन पशुपालन विभाग में प्रस्तुत किया। लगभग 28 लाख रुपये की कुल लागत वाले इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए उन्हें शासन से 10 लाख रुपये का अनुदान (सब्सिडी) स्वीकृत हुआ, जबकि शेष राशि का इंतजाम उन्होंने 15 लाख रुपये का बैंक ऋण लेकर किया। व्यवसाय के शुरुआती दिनों में सुरेन्द्र ने 105 भेड़ों 100 मादा और 5 नर के साथ कदम आगे बढ़ाए थे। उनकी लगातार देखरेख का ही नतीजा है कि आज उनके पास भेड़ों का कुनबा बढ़कर लगभग 135 से 136 तक पहुंच चुका है।

 बाजार में मांग के समीकरणों को समझकर वे इसका व्यवसाय करते हैं, जहां नर भेड़ की मांग हमेशा अधिक रहती है। वर्तमान में वे नर भेड़ को 480 रुपये प्रति किलो और मादा भेड़ को 400 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रहे हैं। जैसे ही भेड़ों का वजन 15 से 16 किलो के आसपास पहुंचता है, खरीदार खुद-ब-खुद सीधे उनके फार्म में पहुंचकर खरीदारी कर लेते हैं। हालांकि शुरुआत के पहले साल में पशुधन के विकास और नवजात बच्चों के पोषण पर ध्यान देने के कारण बिक्री सीमित रही, लेकिन बीते दो वर्षों के भीतर वे करीब 3 लाख रुपये से अधिक की भेड़ें आसानी के साथ बेच चुके हैं।

       सुरेन्द्र ने पशुधन की सुरक्षा और सहूलियत का भी खास ख्याल रखा है। उन्होंने अपनी 5 एकड़ जमीन में से लगभग 2,100 वर्गफीट के दायरे में एक सुव्यवस्थित और हवादार शेड तैयार किया है। भेड़ों को मौसमी बीमारियों और संक्रमण से बचाने के लिए उन्होंने इस शेड को बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से चार अलग-अलग भागों में बांटा है। एक हिस्से में नवजात बच्चों वाली मादाएं, दूसरे में केवल मादाएं, तीसरे में केवल नर और चौथे भाग में बड़े पशु रखे जाते हैं। इसके साथ ही भेड़ों की चराई और दिनभर की देखभाल के लिए उन्होंने दो स्थानीय चरवाहों को रोजगार भी प्रदान किया है। इस पूरे व्यवसाय का एक और बेहद अनूठा और सुखद परिणाम सुरेन्द्र की पारंपरिक खेती पर देखने को मिला है। भेड़ों से प्राप्त होने वाली गोबर की खाद से उनकी मक्के और धान की फसल में चमत्कारिक सुधार आया है। अब उन्हें बाजारों से महंगी रासायनिक खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे यूरिया और डीएपी पर होने वाला उनका भारी-भरकम खर्च लगभग खत्म हो गया है और जमीन की उर्वरता भी बनी हुई है। आज हर महीने बैंक की किश्तें जमा करने और चरवाहों की तनख्वाह देने के बाद भी सुरेन्द्र का परिवार बेहद सम्मानजनक और खुशहाल जीवन जी रहा है। उनकी बड़ी बेटी आईटीआई की पढ़ाई पूरी कर चुकी है और छोटी बेटी 10वीं कक्षा में पढ़ कर रही है।

 सुरेन्द्र का मानना है कि जैसे ही बैंक का लोन पूरी तरह चुकता हो जाएगा, इस व्यवसाय का मुनाफा सीधे तौर पर उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को नई बुलंदियों पर ले जाएगा। तोंगकोंगेरा के सुरेन्द्र देवांगन की यह कहानी आज बस्तर के उन तमाम युवाओं और किसानों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है, जो पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकलकर कुछ नया करने का जज्बा रखते हैं।

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